गंडा बाँधने की रस्म
गुरु द्वारा शिष्य को गंडा बाँधने का दृश्य

गुरु-शिष्य के इस पवित्र रिश्ते की शुरुआत में सच्ची लगन और गुरु दक्षिणा का विशेष महत्व है।
Understand the early struggles of Birju Maharaj, the significance of his Gurus, and the Ganda Bandhan tradition.
Preview · progress not saved — Chapter 1 is free
गुरु द्वारा शिष्य को गंडा बाँधने का दृश्य

गुरु-शिष्य के इस पवित्र रिश्ते की शुरुआत में सच्ची लगन और गुरु दक्षिणा का विशेष महत्व है।
बिरजू महाराज के बचपन का संघर्ष
💡 क्या आप जानते हैं?
बिरजू महाराज के बचपन का नाम 'छोटे नवाब' था और उनकी हवेली पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था! लेकिन उनके बाबूजी (पिता) के देहांत के बाद उनके परिवार को कड़े आर्थिक संघर्षों का सामना करना पड़ा।
इन कठिन दिनों में उनकी माँ पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचती थीं और किसी तरह घर का गुज़ारा करती थीं। इतने मुश्किल समय में भी उनकी माँ ने उन्हें एक बहुत ही मूल्यवान सीख दी:
"खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।"
गुरु-शिष्य परंपरा और गंडा बाँधना
बिरजू महाराज को कथक की कला विरासत में मिली थी। उनके असली गुरु उनके पिता अच्छन महाराज और उनके चाचा शंभू महाराज व लच्छू महाराज थे। घर के संगीतमय माहौल के कारण वे विधिवत प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही देख-देखकर कथक सीख गए थे।
तालीम और गंडा से जुड़े प्रश्न
बिरजू महाराज ने 'गंडा' बाँधने की प्राचीन परंपरा में अपने शिष्यों के लिए क्या बदलाव किया?
बिरजू महाराज के विभिन्न शौक
बिरजू महाराज केवल एक महान नर्तक ही नहीं थे, बल्कि उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनका मानना था कि यदि वे नर्तक न होते, तो शायद एक इंजीनियर होते, क्योंकि मशीनों में उनका मन बहुत लगता था।
बिरजू महाराज के शौक
बिरजू महाराज का व्यक्तित्व बहुआयामी था और खाली समय में वे कई रचनात्मक काम करते थे। अगर बिरजू महाराज नर्तक न होते तो शायद होते, क्योंकि उन्हें किसी भी मशीन या यंत्र को खोलकर उसके कल-पुर्जे देखने की बहुत होती थी। सफर के दौरान वे हमेशा अपने ब्रीफकेस में और दूसरे छोटे-मोटे औजार रखते थे। अपनी बेटी और दामाद को देख-देखकर उन्हें बनाने का भी बड़ा शौक हो गया था। वे प्रायः रात बजे के बाद अपनी इस नई कला का अभ्यास करने बैठते थे। उनके बचपन की बात करें तो, कथक की कला उन्हें में मिली थी। बचपन में आर्थिक तंगी के समय उनकी माँ पुरानी की साड़ियाँ जलाकर गुज़ारा करती थीं और बाद में गुरु से विधिवत तालीम शुरू करते समय उन्हें पवित्र बाँधा गया था।